ध्यान कारो Educational Short Story.
मन में कुछ बना हैं यह पता चला, फिर ढूंढ
ने का प्रयास किया ढूंढ ने के लिए नए – नए
रास्ते खोचे फिर भी कुछ नहीं मिला | लेकिन उसे खुद पर विश्वास
था की मेँ यह पता लगा कर ही रहूँगा कि यह क्या हैं, वह यह जानने
के लिए बहुत उत्साहित था, लेकिन उसके जो रास्ते थे बाहरी | इसके के लिए उसे अपने अंदर के रास्ते से जाना था लेकिन उसे यह पता ही नहीं
था | वो उसे जानने के लिए बाहरी रास्ते खोजने में लगा था, हमें यह बात पता होनी चाहिए कि सारे रास्ते आपके अंदर ही निहित होते हैं इसके
लिए आपको बाहरी सदनों की जरूरत नहीं हैं यह आपके अंदर हैं इसे खोजने का प्रयास करें
| वह व्यक्ति जो उसे बाहरी रास्ते से खोज रहा था उसने बहुत प्रयास
किया ढूंढ ने का पर वो कहीं नहीं मिला और फिर वो एक बार किसी जगल की तरफ जा रहा था
उसे किसी ने गलत बता दिया की जो आप ढूंढ रहे हो वो आपको बहाँ मिल सकता हैं ? उस व्यक्ति ने उसकी बात को सच मन लिया और वो उस जगल की तरफ चल दिया, उसे रास्ते में बहुत सी परेशानिया हुई लेकिन वो उसे जानने के लिए बहुत उत्साहित
था इसलिए उसने परेशानियों को छेल कर वहाँ जाने का फैसला किया | वहाँ तक जाने के लिए उसे 90 दिन लगे और उस स्थान पर वो पहुँच गया और वह उस
मन में बने विचार को आस-पास ढूंढ ने लगा फिर 10 दिन बाद वो एक नदी के पास पहुंचा और
वो व्यक्ति इतना खुश होकर अपनी यात्रा कर रहा था कि उसे यह भी ध्यान नहीं रहा की उसने
100 दिनो से भोजन भी नहीं किया हैं और उसे इसका आभास तब हुआ जब उसे नदी में जल को देखा
और उसने सबसे पहले भोजन करने का फैसला किया और पास में एक आम और सेव के पेड़ लगे दिखाई
दिये और उसने भोजन आम और सेव को खाकर कर लिया
इसके बाद वह अपने उसी लक्ष्य को फॉलो करने लगा और उसे एक जगह एक बूढ़ी माँ दिखी और वह
उनके पास पहुंचा और देखा की वह ध्यान ( Meditation) कर रही थी
|
वह व्यक्ति उसके उठने का इंतजार करने लगा और कुछ समय बाद उनकी
अंखे खुली और उस व्यक्ति ने उनसे सवाल पूछना शुरू कर दिया लेकिन उन्होने कोई जवाब नहीं
दिया फिर उसने उनसे सवाल किया और बूढ़ी माँ ने जवाब देना शुरू कर दिया उन्होने कहा “
जिसे तू बाहर ढूंढ रहा हैं वो तेरे अंदर हैं
और उस व्यक्ति को कुछ भी समझ नहीं आया |
फिर उन्होने कहा जो कुछ हमें मिलता हैं वो सब हमारे अंदर निहित
होता हैं और हम जितना खुद को जानने का प्रयास करेंगे उतना ही हम सुखी रह सकते हैं इस
के लिए आपको बाहरी सदनों की जरूरत नहीं हैं , तू खुद को खोच तू वो सब प सकता हैं जिसकी तुझे
जरूरत हैं | सच्चा आध्यात्मिक
मनुष्य अंतमुखी रहकर आत्मसुख का अनुभव करता हैं , तुम थोड़ा अपने
आपको जानो | अपने आपको पहचानो | अपने भीतर झांक कर देखो | तुम्हें
वहाँ सब मिल जाएगा जो तुम चाहते हो |
“भीतर जितना जाएगा बाहर उतना पाएगा"
~ राजीव भलाणी
यह बातें सुन कर वो व्यक्ति वहाँ से कुछ दूर अपनी कुटिया बनाने
लगा, और सब कुछ त्याग कर वो उस कुटिया में ध्यान करने लगा फिर उसे ध्यान करते 7
साल हो गए फिर उनसे अपने मन में वो विचार को ढूंढने लगा और ऊसे वो मिल गया जिसे वो
ढूंढ रहा था उसने देखा की मन में भगवान बसे हैं | जिसे भगवान
मिल जाते हैं उसे किसी और वस्तु की जरूरत नहीं होती | भगवान मिल
गए तो सब कुछ मिल गया |
इस कहानी मेँ हमें बताया गया हैं कि सुख आपके अंदर हैं उसे बाहर
की वस्तुओ मेँ मत खोचो सब कुछ आपके अंदर ही हैं | भगवान पर विश्वास करो ध्यान
करो और अपने जीवन को आनदंये बनाओ |



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